Ode to The Muslim

Muslims: one of the most hated people in the world. Around the clock they are being projected as one of the deadliest communities in hi-definition pixels and hyperbolic propaganda. Reality deplores them as illusion and illusion consumes whatever remains of their reality. They are the one who are being massacred – clandestinely and openly, displaced en masse, haunted, arrested, jailed, tortured, abused, doubted and humiliated. They are deprived of all their dreams, and accused of creating nightmares that shakes the daydreams of the powers that be. They are the one who pay the price of every single thing they do or believe and the quixotic system that holds the keys of index is hostile to them: in the material world and beyond.

But they are there defiant, resilient and thriving. Even on the verge of being obstinate, insolent and shabby.

Human, they are. Aren’t they? With all their beauty and malady. As everyone is.

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Jama Masjid 2

प्रकाश लखनवी के सुग्गे: पहली छह किस्तें

1.
अगर राजनीति में रटंत को मंजूरी मिल जाए, तो प्रकाश लखनवी के सुग्गे सबसे बड़े मार्क्सवादी होंगे.

2.
मार्क्स खुशकिस्मत थे कि उनके जमाने में प्रकाश लखनवी के सुग्गे नहीं होते थे. वर्ना उन्हें मार्क्सवाद विरोधी आंदोलन शुरू करना पड़ता.

3.
‘मैं मार्क्सवादी नहीं हूं,’ मार्क्स ने क्यों कहा था?
उन्हें पता था, भारत में क्रांति हो या न हो, प्रकाश लखनवी के सुग्गे जरूर होंगे.

3.
प्रकाश लखनवी इन दिनों मुशायरों के बुलावे कबूल नहीं कर रहे हैं. यह उनके भूमिगत रहने के दिन हैं, जब वे अपने सुग्गों के लिए ‘फेसबुक पर घेर कर हमला कैसे करें और घिर जाने पर कैसे भाग चलें’ जैसी कार्यशालाएं चलाते हैं, जिसमें फर्जी अकाउंट से पोस्ट और कमेंट करने ले लेकर बहस के बीच में पोस्ट डिलीट करने तक की अचूक तरकीबें सिखाई जाती हैं.

4.
प्रकाश लखनवी सुग्गों के शौकीन हैं और पोथियों के कारोबारी.

ताल्लुक उनका वैसे तो छपरा से है, लेकिन मार्क्सवाद की तारीख में छपरवी जैसे किसी तखल्लुस की कोई रवायत नहीं रही थी, इसलिए उन्होंने अपने नाम में लखनवी जोड़ लिया. एक से एक बढ़कर शायरों की इस अंजुमन में लखनवी तखल्लुस वाले एक क्रांतिकारी शायर भी हो चुके थे.

उन्होंने तखल्लुस में ही नहीं, सचमुच की जिंदगी में भी लखनऊ को अपना लिया. यह सोच कर कि छपरा की बंजर जमीन न तो क्रांति के लिए मुफीद रही है और न ही पोथियों के कारोबार के लिए, उसे हमेशा के लिए खैरबाद कहा और लखनऊ की सरजमीं को आबाद करने आ गए. लखनऊ के लहलहाते हुए खेत में क्रांति की फसल साल में छह बार कटती है और खलिहान भरा भरा रहता है.

अल्लाह की रहमत से लखनऊ में उन्हें नाम में शोहरत और काम में बरकत दोनों ही हासिल हुई.

सुग्गों का शौक असल में उन्हें यहीं से चढ़ा, जो उनकी पोथियां बांचते हैं, लिखते हैं और बेचते हैं. बिहार की तराई से लेकर पंजाब के खलिहानों तक उनकी पोथियों की रब्त-जब्त इन्हीं सुग्गों की बदौलत है, जो अपने पुराने विरसे के रूप में सियासी आंदोलनों का भविष्यफल, पार्ट टाइम में बांचने का काम भी करते हैं.

5.
प्रकाश लखनवी के सुग्गे मार्क्सवादी कैसे बने?

यह बहुत पुरानी बात नहीं है. तब सुग्गे अमरूद खा खा के मोटे होते थे और छप्परों पर लीद किया करते. उनका निठल्लापन देख कर चाचा चित्रगुप्त ने उनकी सरपरस्ती करने की सोची, जो दादा यमराज के यहां किरानीगीरी करते थे और सुग्गों के पंखों का इस्तेमाल खाता-बही पर लिखने के लिए किया करते थे.

दादा यमराज से कुछ दे-दिला कर उन्होंने सुग्गों को यह जानने का तरीका बता दिया कि भविष्य में क्या होने वाला है.

यह जान कर सुग्गों की आंखें गोल हो गईं.

जब उनकी इस प्रतिभा के बारे में ज्योतिषियों को पता लगा, तो उन्होंने शीशम के दरख्तों को चिरवाया, उसमें लोहे की पतली सींकें बनवाईं और इस तरह सुग्गों को पिजड़ों में बंद कर लिया, ताकि वे उनके ग्राहकों का भविष्यफल बांच सकें.

कैद सुग्गों को रास आ गई.

लेकिन यह वक्त हमेशा नहीं चलने वाला था. भविष्य बताने के दूसरे दावेदार भी मैदान में थे, जिनमें दिन पर दिन इजाफा ही होता जा रहा था. हालांकि उनके सिर पर न दादा यमराज जैसे किसी माहिर का हाथ था, और न ही कोई चाचा चित्रगुप्त उनका सरपरस्त था. लेकिन वे सुग्गों को कड़ी टक्कर दे रहे थे.

सो सुग्गों ने एक जलसा बुलाया, जिसमें यह फैसला किया जाना था कि वे अब किस पेशे में हाथ आजमाएं.

क्रिकेट से लेकर सट्टेबाजी तक के सुझाव पेश और खारिज किए गए. वे कोई ऐसा पेशा अपनाना चाहते थे, जिसमें चढ़ती तो हो, लेकिन गिराई न हो.

‘ऐसा तो एक ही पेशा है, किसी सियासी दर्शन के विशेषज्ञ बन जाते हैं,’ हॉर्लिक्स के शौकीन एक नौजवान सुग्गे ने कहा.

सुग्गों को यह विचार पसंद आया. सियासत हमेशा बनी रहने वाली चीज थी, लेकिन सियासत में जीत भी होती थी और हार भी. लेकिन अगर सियासी दर्शन का माहिर बन जाओ, तो इसमें न कोई जीत थी और न हार. चाहे जैसे भी दिन आएं, जीतने वाले की तरफदारी और हारनेवाले की निंदा हमेशा ही की जा सकती थी. काम भी ऐसा था, कि बिना पर मारे, सब पर नुक्ताचीनी करने और फैसले सुनाने की आजादी थी. ऊपर से दादा यमराज का हाथ सिर पर था ही. हर्र लगे न फिटकरी, लेकिन रंग चोखा था.

तब फिर सवाल था कि कौन सा सियासी रंग चोखा किया जाए?

सुग्गे थे तो हरे रंग के, लेकिन सियासी हरापन से सख्त नफरत. उससे हकीर इस्लामी आतंक की बू आती थी, इसीलिए उन्होंने पिछली सदी में हरी मिर्चें खानी छोड़ दी थीं. बाकी रंगों की सियासतें बिना विशेषज्ञों के भी काम चला लेती थीं. ले दे कर लाल अकेला रंग बचा, जहां कोई गुंजाइश थी.

‘सबसे बड़ी बात यह है कि हम सुग्गों के लिए लाल सबसे फायदेमंद रंग है. हमारी चोंच का रंग भी लाल है और हमें लाल मिर्चें भी बहुत पसंद हैं,’ हॉर्लिक्स की खनखनाती आवाज निकली.

इस सुग्गे की सात पीढ़ियां इसी धंधे में रही आई थीं और उसे इसका काफी तजरबा था. वही था, जिसने प्रकाश लखनवी की सुग्गों से मुलाकात कराई.

प्रकाश लखनवी ने उन्हीं दिनों पोथियों का नया नया कारोबार शुरू किया था. उन्हें पोथियां बांचने, लिखने और बेचने के लिए सुग्गों की दरकार थी.

जोड़ियां जम गईं और सुग्गे मार्क्सवादी हो गए.

6.
सुग्गों की जुबान सुग्गे ही समझ पाते थे. बाकियों को उनकी बात समझने के लिए अनुवाद करना पड़ता या शब्दकोश लेकर चलना पड़ता.

सुग्गे अपनी इस जुबान को क्रांति की बारहखड़ी कहते.

7.
प्रकाश लखनवी के सुग्गों में एक सुग्गा ऐसा भी था, जिसे सपने आते थे कि वह मकाऊ है: सपनों में वह जगमगाते नीले आसमान में उड़ान भरता, जंगल की हरियालियों और नदी के विस्तार के ऊपर अपने रंग-बिरंगे परों को पतवार की तरह चलाते हुए देर तक उड़ता रहता. सामने दूर क्षितिज पर क्रांति का लाल सूरज दिपदिपा रहा होता और पीछे की ओर ध्वस्त पुराने समाज के मलबे से निकलता धुआं उसकी पूंछ को पकड़ने की नाकाम कोशिश करता.

क्रांति उसका सपना थी, और सुग्गापन उसका दुस्वप्न.

उसने लखनवी का गिरोह छोड़ दिया. यह आसान था.

लेकिन दुस्वप्न से पीछा छुड़ाना आसान नहीं था.

गुड़हल ने उसे बैरंग लौटा दिया.

मक्के के भुट्टों ने उसे दुरदुरा दिया.

समंदर उसे लील जाने को दौड़ा.

नदी बच्चों के खेल में मगन थी.

और बच्चे अपनी मुस्कानों में.

बर्फ से ढंकी वादियों ने अपने कान बंद कर लिए.

और जलती हुई ज्वालामुखियों ने जीभ लपलपाई.

गेहूं की पकी हुई बालियों और गाजर की जड़ों ने ऐसे दिखाया जैसे वो उसे जानते ही न हों.

वे जानते थे, कि प्रकाश लखनवी के सुग्गे उस गिरोह से आते हैं, जो क्रांति के चंदे से गुलामी का फंदा खरीद कर खैरात में बांटते हैं.

फिर सुग्गे ने एक रंगरेज को फुसलाया, जो अंगरेजों के जाने के बाद अकेला रह गया था. उसने चील के चुराए हुए पंखों को चटख रंगों में रंगवाया: लाल, पीले, नीले, भूरे और सफेद.
रंगे हुए पंखों का सबसे बड़ा फायदा यह था कि वह लोगों को देख कर रंग बदल सकता था. जब जैसा मौका हुआ, उस रंग का पंख लगा लिया.

राजधानी ने उसके रंग देखे थे. उसे अब उसकी सियासत देखनी थी.

आनेवाले दिनों में वह हर बात को बहस का विस्तार देने और हर सवाल को एक जवाबहीन संदर्भ देने के लिए जाना गया. आप उससे सवाल करें, वह संदर्भ बताएगा. आप कुछ भी कहें, वह कहेगा कि यह लंबी बहस हुआ करती थी. और आपसे असहमत हो जाएगा.
वह जताएगा कि आप कुछ नहीं जानते और वह सब जानता है. इस तरह वह निर्णायक रूप से कुछ भी कहने से खुद को बचा लिया करता: अपने बारे में भी और दुनिया के बारे में भी.

वह पैदाइशी बुद्धिजीवी था. दुनिया में इल्म का कोई भी हलका उसकी पहुंच से बाहर नहीं था. क्रांति के हर पहलू को वह अपने परों में समेट लेना चाहता था. मुश्किल यह थी कि उसके नकली पर, ऐन वक्त पर धोखा दे जाते और वह औसत दर्जे का गपोड़ी रह जाता.

अपने चारों ओर रहस्य की आभा और महानता की धुंध में अपने परों की जालजासी को छुपाए मकाऊ राजधानी की गलियों में क्रांति का कुटीर उद्योग चलाता है: रंगे हुए परों और उधार की बुद्धि किसी भी सुग्गे को मकाऊ की एक कमतर किस्म बनाने को काफी होती है. अक्सर उसे एकाध सुग्गे ऐसे मिल ही जाते हैं, जिनमें बिना फिटकरी लगाए रंग चोखा करने की ललक होती है. रंगे हुए पर वह रेवड़ी की तरह बांटता और बदले में वफादारी का थोक माल, एहसान का बोझ लादते हुए, कबूल करता.

मकाऊ के पास कभी काम की कमी न थी और फुरसत की भी. मसरूफ वह कभी भी हो सकता था, बहस वह कहीं भी कर सकता था, गंभीर वह कितना भी हो सकता था.

वह हंसता तो सोना तोलने के तराजू पर वजन करके.

खुर्दबीन उसके पास एक ऐसी थी, कि वह किसी भी रचना में राजनीतिक मसला और गंभीर असहमति खोज ले. आप जानना चाहेंगे कि वह मसला क्या है. मकाऊ असहमत किस पर है. ‘बैठेंगे,’ यह मकाऊ का अगला फिकरा होता. लेकिन कयामत गुजर जाती, बैठकों के दौर पर दौर आते और चले जाते, और आपको पता नहीं लगता कि आपकी रचना को रद्दी बनाने वाला वह नुक्स क्या था.

उसे तसल्ली है, कि वह सुग्गा नहीं, मकाऊ है और क्रांति के लिए काम कर रहा है. कामयाबी, रंगे हुए पंख लगा कर सलामी दाग रहे वफादार मकाऊ गिरोहों की फौज का दूसरा नाम थी.

लेकिन कहनेवाले तो यह तक कहते हैं कि खुद को मकाऊ के रूप में पेश करने वाला सुग्गा, असल में सुग्गा भी नहीं है. वह तो उल्लू है, जिसका बसेरा बने बागों की किस्मत में वीरान होना ही लिखा है.

एदुआर्दो गालेआनो: सिर के बल खड़ी दुनिया को सीधी करने की जद्दोजहद

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(3 सितंबर 1940- 13 अप्रैल 2015)

‘एदुआर्दो गालेआनो को छापना दुश्मन को छापना है: झूठ, उदासीनता और सबसे बढ़ कर फरामोशी का दुश्मन. उनका शुक्रिया, कि हमारे अपराध याद रखे जाएंगे. उनकी नजाकत, तबाह कर देने वाली है, उनकी सच्चाई गुस्से से भरी हुई है’

-जॉन बर्जर

‘हकीकत आपसे अच्छी चीजों को याद रखने और उन्हें लिखने के लिए कहती है. अगर लिखने के पेशे का कोई औचित्य है तो वो हकीकत के चेहरे से मुखौटा हटाने में मदद की जाए और इसे उजागर किया जाए कि दुनिया कैसी है, कैसी थी और अगर हम इसे बदल देते हैं तो कैसी होगी’

-एदुआर्दो गालेआनो

साल 2009 के 13 अप्रैल को युकातान के शहर में मानी के एक कॉन्वेंट के आंगन में बयालीस फ्रांसिस्कन ब्रदर्स ने एक मजलिस बुलाई ताकि स्थानीय संस्कृति को लगाए गए जख्मों को भरा जा सके.

‘हमने माया लोगों से माफी की गुजारिश की, कि हम दुनिया के बारे में उनके नजरिए को, उनके धर्म को नहीं समझ सके, कि हमने उनकी दिव्यता को नकारा, कि हमने उनकी संस्कृति का आदर नहीं किया, कि हमने अनेक सदियों तक उन पर एक ऐसा धर्म थोपे रखा, जिसे वे समझते नहीं थे, कि हमने उनकी मजहबी रस्मों को शैतानी करार दिया, और हमने उनसे यह कहने और लिखने के लिए माफी देने की गुजारिश की ये शैतान का काम था और उनकी मूर्तियां खुद शैतान का साकार रूप थीं.’

साढ़े चार सौ साल पहले, ठीक उसी जगह पर, एक दूसरे फ्रांसिस्कन ब्रदर दिएगो दे लांदा ने माया लोगों की किताबें और उन्हीं के साथ उनकी सामूहिक यादों की आठ सदियों को जला दिया था.

एदुआर्दो गालेआनो ने इसी तारीख को, दुनिया को अलविदा कहा. बेशक, यह तारीख चुनना उनके हाथ में नहीं रहा होगा, लेकिन इस तारीख के साथ गालेआनो का एक अद्भुत रिश्ता रहा. गालेआनो अपनी जिंदगी भर, उन मिटा दी गई सामूहिक यादों की सदियों को और भुलाए जा रहे वर्तमान के अपराधों को अपने लेखन में दर्ज करते रहे. वे इस सदी के, और पिछली सारी सदियों की यादों के रखवाले थे. जुल्म और जिल्लत की यादें. प्रतिरोध और सपनों की यादें.

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Dastoor by Habib Jalib

 

पाकिस्तान के राजनीतिक कार्यकर्ता और गायक अम्मार राशिद की आवाज में हबीब जालिब का गीत दस्तूर. अम्मार ने यह गीत 16 नवंबर 2014 को जेएनयू में एक कार्यक्रम में गाया था.

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A song: Intesaab by Faiz

 

पाकिस्तान के राजनीतिक कार्यकर्ता और गायक अम्मार राशिद की आवाज में फैज अहमद फैज का गीत इंतेसाब. अम्मार ने यह गीत 16 नवंबर 2014 को जेएनयू में एक कार्यक्रम में गाया था.